सावन सोमवार व्रत भारत में सबसे व्यापक रूप से किए जाने वाले व्रतों में से एक है। 2026 में उत्तर भारत में चार सोमवार पड़ रहे हैं — 3, 10, 17 और 24 अगस्त। पूरी तिथि सूची सावन 2026 कैलेंडर में है।

व्रत रखने से पूर्व कुछ बातें स्पष्ट होनी चाहिए — नियम क्या हैं, फलाहार में क्या ले सकते हैं, और वह बात जो सबसे कम बताई जाती है — किन परिस्थितियों में व्रत नहीं रखना चाहिए।

सावन सोमवार व्रत क्या है

सावन मास के प्रत्येक सोमवार को रखा जाने वाला उपवास सावन सोमवार व्रत कहलाता है। इसके तीन प्रचलित रूप हैं।

प्रकारविवरण
सावन सोमवारकेवल सावन के सोमवार
सोलह सोमवारलगातार सोलह सोमवार, किसी भी मास से
प्रदोष व्रतत्रयोदशी को, सोमवार पड़ने पर सोम प्रदोष

2026 में उत्तर भारत की तिथियाँ हैं — 3, 10, 17 और 24 अगस्त। अमांत क्षेत्रों में — 17, 24, 31 अगस्त और 7 सितंबर।

व्रत के नियम

प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठें, स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, और व्रत का संकल्प लें — उसका उद्देश्य और अवधि स्पष्ट करें।

इसके पश्चात मंदिर जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करें, बेलपत्र, सफ़ेद पुष्प और चंदन अर्पित करें, तथा "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। शिव चालीसा अथवा सोमवार व्रत कथा का पाठ भी किया जाता है। मंदिर में पूजा की विस्तृत विधि अलग लेख में दी गई है।

दिनभर सात्विक आचरण रखें। क्रोध, कलह और निंदा से बचें, और दिन में शयन न करें। संध्या के समय प्रदोष काल में पुनः पूजा और आरती करें।

व्रत का पारण सामान्यतः सूर्यास्त के बाद संध्या पूजा के पश्चात किया जाता है। पहले प्रसाद ग्रहण किया जाता है, फिर भोजन। कुछ परंपराओं में अगले दिन प्रातः पारण का विधान है।

व्रत में क्या खाएं, क्या न खाएं

व्रत में फल और फलों का रस, दूध, दही, छाछ, सूखे मेवे, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, अरबी, सेंधा नमक और मखाना ग्रहण किए जा सकते हैं।

अन्न — गेहूँ, चावल, दालें — साधारण नमक, प्याज़, लहसुन, मांस-मछली, अंडा, मदिरा और तामसिक भोजन वर्जित हैं।

व्रत का प्रकारविवरण
निर्जलजल भी नहीं — केवल स्वस्थ व्यक्ति
फलाहारफल और दूध
एक समयदिन में एक बार सात्विक भोजन
सामान्यफलाहार + संध्या पारण (सर्वाधिक प्रचलित)

निर्जल व्रत केवल तभी रखें जब स्वास्थ्य अनुमति दे। शास्त्रों में भी शरीर की क्षमता के अनुसार व्रत का विधान है।

सोलह सोमवार व्रत — क्या अंतर है

सोलह सोमवार व्रत लगातार सोलह सोमवार तक किया जाता है। परंपरा में इसे विशेष रूप से विवाह और मनोकामना पूर्ति से जोड़ा गया है।

इसे किसी भी मास के सोमवार से आरंभ किया जा सकता है, किंतु सावन का प्रथम सोमवार सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है।

इसमें कुछ विशेष नियम हैं — व्रत सोलह सप्ताह तक अखंड रखा जाता है, प्रत्येक सोमवार सोलह सोमवार व्रत कथा का पाठ होता है, और गेहूँ के आटे, गुड़ तथा घी से बना चूरमा प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है। सत्रहवें सोमवार को उद्यापन किया जाता है।

यदि कोई सोमवार छूट जाए, तो इस विषय में मत भिन्न हैं। कुछ परंपराओं में पुनः आरंभ करने का विधान है, तो कुछ में छूटे सोमवार की पूर्ति आगे कर लेना पर्याप्त माना जाता है।

किसे व्रत नहीं रखना चाहिए

यह वह भाग है जो प्रायः नहीं बताया जाता, और यही ईमानदारी पाठक का विश्वास बनाती है।

यदि मधुमेह, रक्तचाप की समस्या हो, गर्भावस्था या स्तनपान की अवधि हो, कोई नियमित औषधि चल रही हो, हाल में कोई शल्यक्रिया हुई हो, अथवा दुर्बलता हो — तो व्रत रखने से पूर्व चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

बच्चों और वृद्धजनों के लिए पूर्ण उपवास के स्थान पर संकल्प और पूजा में सम्मिलित होना पर्याप्त माना जाता है।

एक बात स्पष्ट रहे — शास्त्रों में कहीं यह नहीं कहा गया कि व्रत से शरीर को कष्ट देना चाहिए। भक्ति का उद्देश्य समर्पण है, स्वयं को पीड़ा देना नहीं। यदि उपवास संभव न हो, तो केवल पूजा और जप करें, एक समय सात्विक भोजन लें, दान करें और कथा श्रवण करें। यह भी उतना ही मान्य है।

व्रत का ज्योतिषीय आधार

सोमवार का स्वामी चंद्रमा है। "सोम" चंद्रमा का ही नाम है।

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है — भावनाएँ, मानसिक स्थिति, स्मृति और माता से संबंध इसी से देखे जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, जब चंद्रदेव दक्ष प्रजापति के श्राप से क्षय होने लगे, तब उन्होंने शिव की आराधना की, और शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर स्थान दिया। तभी से शिव सोमेश्वर कहलाए और सोमवार उन्हें समर्पित हुआ।

परंपरा के अनुसार, जिनकी कुंडली में चंद्रमा पीड़ित हो, उनके लिए सोमवार की उपासना विशेष रूप से उपयुक्त कही गई है। मन का अस्थिर रहना, अकारण चिंता, निर्णय लेने में कठिनाई और नींद की समस्या — ये सामान्य संकेत माने जाते हैं।

किंतु ये लक्षण किसी भी सामान्य व्यक्ति में हो सकते हैं। यह कोई निदान नहीं है। आपकी कुंडली में चंद्रमा वास्तव में किस स्थिति में है, कौन सी दशा चल रही है — यह व्यक्तिगत विश्लेषण से ही स्पष्ट होता है।